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कैसा हो घर का इंटीरियर

घर की आंतरिक साज-सज्जा में वास्तुशास्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। घर का इंटीरियर डेकोरेशन करते समय घर के भीतरी दीवारो के रंग-संयोजन, पर्दो के डिजाइन, फर्नीचर, कलाकृतियां, पेंटिंग, इनडोर प्लांट्स, वॉल टाइल्स, सीलिंग का पीओपी, अलमारियां और फैंसी लाइट आदि को वास्तु के अनुरूप ही बना सकें तो यह एक पूर्ण वास्तु की स्थिति होगी। 

वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन के मुख्य द्वार के आसपास एवं घर में प्रवेश करने वाले रास्ते में दोनों ओर सुंदर फूलों की क्यारी एवं हरा-भरा लॉन होना चाहिए। घर के आगे के लॉन में लगी श्याम तुलसी व हरे-भरे पौधे घर में प्रवेश करते ही मन को प्रफुल्लित कर देंगे। 

भवन का प्रवेशद्वार 

यह आपके भवन का वह भाग है जहां से कि मुख्य भवन में प्रवेश किया जाता है। यहां पर रास्ता छोड़कर एक अथवा दोनों ओर लकड़ी से बना हलका फर्नीचर एवं हलका रंग-रोगन होना चाहिए और इस भाग को सदा साफ-सुथरा रखना चाहिए। भवन के इस भाग में फ्लोर कारपेट का प्रयोग न करके कोई पायदान रखा जाए तो बेहतर है। यहां कभी भी दिवंगत पूर्वज, युद्ध के दृश्य, हिंसक पशुओं के पोस्टर आदि न लगाकर स्वागत करने जैसा एहसास दिलाने वाले दृश्य जैसे- स्वस्तिक, लक्ष्मी-गणेश जी या फिर धर्म के शुभ संकेत आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो घर में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। ड्राइंग रूम हो आरामदेह किसी भी भवन का ड्राइंग रूम अथवा स्वागत कक्ष एक प्रमुख भाग होता है। जिसमें मेहमानों और मित्रों का स्वागत किया जाता है। वास्तु शास्त्र में स्वागत कक्ष की सर्वोत्तम दिशा उत्तर-पश्चिम में स्थित वायव्य कोण बताई गई है। इस क्षेत्र का मूल तत्व वायु है जिसकी प्रकृति चलायमान होती है। ऐसे ड्राइंग रूम में सभी फर्नीचर लकड़ी के बने होने चाहिए। लकड़ी से बने हुए ऐसे फर्नीचर जिनके कोने तीखे न होकर चौड़ी गोलाई लिए हुए हों वास्तु सम्मत होंगे। वायव्य दिशा में बने ड्राइंग रूम में हलका हरा, हलका स्लेटी, सफेद या क्रीम रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि ड्राइंग रूम में उत्तर दिशा में खिड़कियां-दरवाजे हों तो उन पर हरे आधार पर बने नीले डिजाइन जिसमें कि जल की लहरों जैसी डिजाइन के पर्दे होने चाहिए। ऐसे हलके और बिना लाइनिंग वाले पर्दो का प्रयोग सर्वोत्तम होता है। ड्राइंग रूम में गृहस्वामी की कुर्सी या बैठने का स्थान कुछ इस प्रकार होना चाहिए कि बैठने पर उसका मुख सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर हो। 

पूजा स्थल का इंटीरियर 

घर का पूजा स्थल सदैव घर की पूर्व-उत्तर दिशा में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व की ओर हो। ऐसी स्थिति में यह बात विशेष ध्यान देने की है कि पूजा स्थान में जल का कलश सदा आपके बायीं ओर अर्थात पूजा स्थान के उत्तर में हो व ज्योति या धूप-अगरबत्ती को ज्वलित करने का स्थान सदा आपकी दायीं ओर हो। ऐसे में पूजा स्थान भी आंतरिक रूप से इस प्रकार व्यवस्थित हो सकेगा कि ईशान कोण में जल और आग्नेय कोण में अग्नि को स्थान मिलेगा। प्राय: पूजा के स्थान में लोग सजावट के लिए लाला रंग के बल्बों का प्रयोग करते है, जो सर्वथा अनुचित है। यहां नेचुरल सफेद, पीले या नीले रंग का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही पूजा के कमरे की दीवारों को भी हलके नीले या पीले रंग से पेंट करवाना चाहिए। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि घर के पूजास्थल में भड़कीले रंगों के बजाय सौम्य रंगों का इस्तेमाल हो। 

बेडरूम भी हो वास्तु अनुसार 

वास्तु के अनुसार रॉट आयरन के फर्नीचर बेडरूम में नहीं होने चाहिए। आपके बेडरूम का फर्नीचर भी लकड़ी का बना होना चाहिए। यहां की दीवारों पर पेस्टल या बहुत हलके रंगों का प्रयोग करना चाहिए। सफेद, क्रीम, ऑफ व्हाइट, आइवरी, क्रीम आदि रंग सभी दिशाओं में बने बेडरूम के लिए ठीक रहते है। नव-विवाहित दंपती के बेडरूम में हलका गुलाबी और बच्चों के कमरे में हलका बैगनी या हलके हरे रंग का भी प्रयोग कर सकती हैं। आप प्रयास करे कि बेडरूम के भीतर हलके-फुलके चित्र जो कि परस्पर प्रेम, स्नेह, अपनेपन आदि के प्रतीक हों, लगाएं। ध्यान रखें कि किसी भी कमरे के पर्दो पर एब्सट्रैक्ट पेंटिंग, हिंसक पशुओं की आकृति या सांप आदि जैसे डिजाइन न हों। हलके-फुलके फूलों या बेलों के दृश्य बेडरूम में चार-चांद लगा सकते है। सिरहाने के पास टिक-टिक करने वाली घड़ी या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान नहीं होना चाहिए। यहां पर सजावट के लिए प्रयोग किए जाने वाले इनडोर प्लांट बिलकुल नहीं होने चाहिए क्योंकि इन पौधों से रात को कार्बन-डाईआक्साइड निकालता है जो कि आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसी को वास्तु में नकारात्मक ऊर्जा का नाम दिया गया है। पति-पत्नी के कमरे में सुंदर शो-पीस या सौम्य पक्षियों की आकृति जैसे-लव-बर्ड को सदा जोड़े में ही रखना चाहिए। बेडरूम में कारपेट न हो तो अच्छा है। 

स्टडी रूम की आंतरिक व्यवस्था 

बच्चों के स्टडी रूम में पढ़ाई वाली टेबल को कुछ इस प्रकार रखें कि पढ़ते समय बच्चों का मुख सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर रहे। टेबल के सामने थोड़ा स्थान होना चाहिए और सीट के पीछे दीवार का होना सर्वोत्तम है। ठोस संरचना के कारण बच्चे को लंबे समय तक बैठने की इच्छा होगी व मन स्थिर रहेगा। चंचल मन सदा पढ़ाई में बाधा डालता है। अर्थात आपकी पीठ के पीछे कोई खिड़की, दरवाजा या इसी प्रकार का खुला स्थान नहीं होना चाहिए। बल्कि आपके मुख के सामने, दायीं ओर या बायीं ओर कोई खिड़की या दरवाजा न हो तो सर्वोत्तम है। इस कक्ष में पेस्टल ग्रीन, क्रीम, सफेद या हलका नीला रंग होना चाहिए। पढ़ने के क्षेत्र के आसपास टूटी-फूटी चीजें, गंदगी, जूते आदि नहीं होने चाहिए। किताबों की अलमारी कमरे की दक्षिण या पश्चिम की दीवार पर होनी चाहिए। बच्चों को सोते समय पूर्व अथवा दक्षिण में सिर रखकर सोना चाहिए। 

किचेन को बनाएं सकारात्मक 

किचेन में गैस का चूल्हा हमेशा पूर्व दिशा में बनी स्लैब के ऊपर हो व बर्तन व हरी सब्जियां आदि धोने के लिए सिंक आपके बायीं ओर पूर्वोत्तर के कोण में रहे। स्लैब पर काले रंग के पत्थर प्रयोग न करे क्योंकि काला रंग शनि एवं अग्नि तत्व का द्योतक है और वास्तु में यह एक सुखद स्थिति नहीं है। किचन के दक्षिण पूर्व की स्लैब पर किसी कोने में हरे-भरे पौधे यहां पर ताजगी का एहसास कराते है एवं काष्ठ तत्व की उपस्थिति द्वारा इस क्षेत्र को सदैव कल्याणकारी बनाए रखते है। किचन की दीवारों पर गुलाबी या हलका रंग सर्वोत्तम है। किचेन में भगवान, परिवार सदस्यों, पूर्वजों आदि के चित्र न लगा कर सुंदर प्राकृतिक दृश्यों वाले लैंडस्केप का प्रयोग करना चाहिए। 

कैसा हो बाथरूम 

यहां पानी के नल उत्तर अथवा पूर्व की दीवारों पर ही होने चाहिए तथा कमोड या सीट इस प्रकार लगाई जाए कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति का मुख सदा दक्षिण अथवा उत्तर में रहे। फर्श पर काले रंग की टाइलें न लगवाएं। नहाने का टब उत्तर अथवा पूर्व की दीवार के साथ लगवाएं तथा बाथरूम का दरवाजा हमेशा पूर्वोत्तर के कोने में होना चाहिए। शीशे के लिए सर्वोत्तम दिशा पूर्व अथवा उत्तर की दीवार होती है। आजकल बाथरूम के साथ ड्रेसिंग रूम भी बनाए जाते है। ड्रेसिंग रूम में अलमारी दक्षिण या पश्चिम की दीवार के साथ लगाई जानी चाहिए। दीवारों की टाइलों में मोटिफ अथवा डिजाइन भी एब्सट्रैक्ट नहीं होने चाहिए। टॉयलेट के दरवाजे को हमेशा बंद रखना चाहिए। 

जरूरी है भवन में ऊर्जा संतुलन 

इसके अलावा वास्तुशास्त्र के अनुसार पूर्व एवं उत्तर दिशा में बड़े-बड़े दरवाजे खिड़कियां रखी जानी चाहिए। वहां पर कोई भारी या बड़ा सामान या बड़े पर्दे नहीं लगाए जाने चाहिए। इसके विपरीत दक्षिण एवं पश्चिम की दिशा को बंद, भारी व इस प्रकार रखें कि यहां से कोई विशेष धूप, तीव्र प्रकाश या तीव्र वायु भवन में प्रवेश न कर सके। इसको वास्तुशास्त्र की शब्दावली में भवन के ऊर्जा संतुलन की संज्ञा दी गई है। घर में खराब या रुकी हुई घड़ियां नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा मुख्य द्वार के आसपास कैक्टस की कंटीली झाड़ियां, सूखे ठूंठ पेड़, कूड़ेदान, कोई टीला, गड्ढा, सीवर का मेनहोल आदि नहीं होना चाहिए। यदि हो सके तो सुबह-सवेरे अपने म्यूजिक सिस्टम पर हलकी-फुलकी धार्मिक धुनें या गायत्री मंत्र आदि को सुनना आपके संपूर्ण भवन को वास्तु की सकारात्मक ऊर्जा से लगातार परिपूर्ण करता रहेगा।

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